भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में मूल अपराध, आपराधिक प्रक्रिया और साक्ष्य के नियम शामिल हैं। इसके आधुनिक प्रमुख कानूनों में भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता शामिल हैं; विशेष अपराधों के लिए अलग कानून भी हैं। अपराध संज्ञेय या असंज्ञेय तथा जमानती या गैर-जमानती हो सकता है। ये वर्गीकरण पुलिस की शक्तियों और प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, लेकिन गैर-जमानती का अर्थ यह नहीं कि जमानत कभी मिल ही नहीं सकती। कई संज्ञेय अपराधों के लिए पुलिस को दी गई सूचना प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप में दर्ज की जा सकती है, जिसे FIR कहते हैं। अन्य शिकायतें अलग प्रक्रिया अपना सकती हैं या मजिस्ट्रेट की अनुमति की ज़रूरत हो सकती है। पुलिस दस्तावेज़, बयान, भौतिक सबूत, डिजिटल सामग्री और विशेषज्ञों के निष्कर्ष इकट्ठा करके जाँच करती है। वह केवल कानूनी अधिकारों के अंतर्गत ही गिरफ्तारी कर सकती है और उसे प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का पालन करना होता है। गिरफ्तार व्यक्ति को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्राप्त है, जिसमें गिरफ्तारी के आधार की जानकारी, कानूनी सहायता तक पहुँच और समय पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना शामिल है। अदालतें हिरासत की निगरानी करती हैं और जमानत के आवेदनों पर फैसला करती हैं। अभियोजन पक्ष को आपराधिक मामलों में लागू प्रमाण के मानक के अनुसार आरोप साबित करना होता है। अभियुक्त निष्पक्ष प्रक्रिया, सबूतों को चुनौती देने का अवसर और निर्दोषता की धारणा का लाभ पाने का अधिकारी है। आमतौर पर आपराधिक मामला जाँच, पुलिस रिपोर्ट या शिकायत, आरोपों पर न्यायिक विचार, साक्ष्य, बहस और फैसले के चरणों से गुजरता है। कुछ फैसलों के बाद अपील या पुनरीक्षण उपलब्ध हो सकते हैं। पीड़ितों और गवाहों को सबूत सुरक्षित रखने चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षा या सहायता लेनी चाहिए। अपराध और परिस्थितियों के अनुसार मुआवज़ा, कार्यवाही में भागीदारी या विशेष प्रक्रिया उपलब्ध हो सकती है। हिंसा, धमकी, बच्चों, मानव तस्करी या गैरकानूनी तरीके से बंद रखने वाले मामलों में तत्काल सुरक्षा सबसे पहले आती है। आपराधिक कार्यवाही से स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा पर गंभीर असर हो सकता है, इसलिए शिकायतकर्ता और अभियुक्त—दोनों को जल्दी विश्वसनीय कानूनी सहायता लेनी चाहिए।
भारत में आपराधिक कानून
भारत में आपराधिक कानून अपराधों को परिभाषित करता है, जाँच और मुकदमे की प्रक्रिया तय करता है तथा पीड़ितों, गवाहों और अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा करता है। पुलिस, अभियोजक, मजिस्ट्रेट, अदालतें और फोरेंसिक सेवाएँ अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं। प्रथम सूचना रिपोर्ट, जिसे आम तौर पर FIR कहा जाता है, कई पुलिस जाँचों का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड है, लेकिन अपने आप में दोषसिद्धि नहीं है।
VivAVia से गलतियाँ हो सकती हैं। महत्वपूर्ण जानकारी की जाँच करें।

