अंगोला में मानव उपस्थिति पुरापाषाणकाल तक जाती है। नामीबे प्रांत में त्शितुन्दु-हुलु की शैलकला का समय वर्तमान से लगभग 2,600 से 2,000 वर्ष पूर्व का माना जाता है; सान समुदायों से इसका संबंध संभावित माना जाता है, लेकिन इसका कालक्रम और अर्थ पूरी तरह निश्चित नहीं है। पहली सहस्राब्दी ईस्वी से (सहस्राब्दी 1) बान्तु भाषाएँ, लौह-प्रसंस्करण और कृषि विभिन्न क्षेत्रों में असमान रूप से फैले। क्षेत्र के अनुसार इसमें सह-अस्तित्व, विस्थापन और आत्मसातीकरण शामिल थे। दूसरी सहस्राब्दी के दौरान (सहस्राब्दी 2) कोंगो, न्दोंगो, मताम्बा और लुंडा सहित कई राजनीतिक केंद्र और राज्य उभरे। कोंगो राज्य लगभग 14वीं से 19वीं शताब्दी तक (शताब्दियाँ 14–19) अस्तित्व में रहा। म्बान्ज़ा कोंगो उसका राजनीतिक और आध्यात्मिक केंद्र था। पुर्तगाली संपर्क 15वीं शताब्दी में शुरू हुए; न्ज़िंगा न्कुवु ने 1491 में ईसाई धर्म अपनाया। अफोंसो प्रथम ने कूटनीति, शिक्षा और व्यापार का उपयोग किया, जबकि दास व्यापार ने सत्ता-संरचनाओं और आबादी को अस्थिर किया। 1665 की अम्बुइला की लड़ाई ने कोंगो की राजनीतिक स्थिति में दीर्घकालिक गिरावट की शुरुआत की। न्दोंगो और मताम्बा म्बुन्दु राज्य थे। न्गोला की उपाधि ही आगे चलकर अंगोला का नाम बनी। न्जिंगा म्बांडे, जो लगभग 1580 से 1663 तक जीवित रहीं, ने पुर्तगाली विस्तार के विरुद्ध कूटनीति, गठबंधनों और सैन्य प्रतिरोध का संयोजन किया। आज उन्हें राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है। फिर भी पुर्तगाली रिपोर्टें, मिशनरी स्रोत और मौखिक परंपराएँ उनके चित्रण में अलग-अलग बातों पर जोर देती हैं और उनकी आलोचनात्मक तुलना आवश्यक है। पुर्तगाल ने 15वीं और 16वीं शताब्दियों से (शताब्दियाँ 15–16) तटीय ठिकाने स्थापित किए। लुआंडा 1575 या 1576 में औपनिवेशिक केंद्र बना। व्यापार, मिशन, किले और दास व्यापार ने तटीय क्षेत्र को आकार दिया; नीदरलैंड ने 1641 से 1648 तक लुआंडा पर कब्जा रखा। लंबे समय तक आंतरिक भूभाग पर पुर्तगाली नियंत्रण सीमित रहा। 19वीं शताब्दी में 1854 के एक आदेश और 1856 से 1875 तक के रजिस्टरों ने गुलाम बनाए गए लोगों का अधिक सुदृढ़ प्रशासनिक अभिलेखन किया। पुर्तगाल ने अपने शासनक्षेत्र में 1869 में दासता समाप्त की। इसके बाद औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था संसाधन निष्कर्षण, कृषि, कराधान और जबरन श्रम के माध्यम से बदली। 1884 से 1885 का बर्लिन सम्मेलन क्षेत्रीय कब्जे को तेज करने वाला बना; प्रभावी औपनिवेशिक एकीकरण मुख्यतः 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 20वीं शताब्दी के आरंभ में (शताब्दियाँ 19–20) हुआ। क्षेत्रों का विकास एक समान नहीं हुआ। लुआंडा और तट पर बंदरगाह, औपनिवेशिक प्रशासन और अटलांटिक व्यापार का प्रभाव था। उत्तर-पश्चिम कोंगो क्षेत्र से जुड़ा रहा। मध्य उच्चभूमि को ओविम्बुन्दु समाजों और व्यापारिक नेटवर्कों ने आकार दिया और बाद में यह यूनिटा का आधार बना। पूर्व में लुंडा-चोक्वे संबंधों के साथ-साथ हीरा और युद्ध अर्थव्यवस्थाओं ने हाल के इतिहास को प्रभावित किया। दक्षिण ओवाम्बो समाजों, मन्दुमे और सीमा संघर्षों से जुड़ा है। काबिन्दा का एन्क्लेव-स्थिति, संधियों, विलय और अलगाववादी स्मरण का अपना इतिहास है। बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में राष्ट्रवादी और उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन तेज हुए। एमपीएलए 1956 में, एफएनएलए 1961 में और यूनिटा 1966 में उभरे। उपनिवेशवाद-विरोधी युद्ध 1961 से 1974 तक चला। 25 अप्रैल 1974 को पुर्तगाल में कार्नेशन क्रांति के बाद 15 जनवरी 1975 को अल्वोर समझौते (Acordos de Alvor) हुए। 11 नवंबर 1975 को अगोस्तिन्यो नेटो के नेतृत्व में अंगोला ने स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके बाद एमपीएलए, एफएनएलए और यूनिटा के बीच संघर्ष पर शीत युद्ध के बाहरी पक्षों का प्रभाव पड़ा, जिनमें क्यूबा, सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और ज़ैरे शामिल थे। गृहयुद्ध 1975 से 2002 तक चला। एमपीएलए सरकार ने मुख्यतः यूनिटा के विरुद्ध युद्ध किया; एफएनएलए ने विशेषकर युद्ध के शुरुआती वर्षों में भूमिका निभाई। 1991 के बिसेसे समझौते (Acordos de Bicesse) से 1992 में बहुदलीय चुनाव हुए। यूनिटा की हार के बाद भी युद्ध जारी रहा। 1994 के लुसाका प्रोटोकॉल (Protocolo de Lusaka) से स्थायी समाधान नहीं निकला। 2002 में जोनास साविम्बी की मृत्यु के बाद 4 अप्रैल 2002 के लुएना ज्ञापन (Memorando do Luena) से युद्धविराम, निरस्त्रीकरण और एकीकरण हुआ। विस्थापन, वापसी, बारूदी सुरंगें और सामाजिक परिणाम आज भी कई क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। युद्धोत्तर काल में शांति, पुनर्निर्माण, तेल से गहराई से प्रभावित अर्थव्यवस्था, नया बुनियादी ढाँचा और साथ-साथ असमान विकास शामिल हैं। जोआओ लौरेंको ने 2017 में राष्ट्रपति पद संभाला। समकालीन ऐतिहासिक शोध में औपनिवेशिक हिंसा, स्वतंत्रता संग्राम और गृहयुद्ध की राज्य-केंद्रित, विपक्ष-केंद्रित, क्षेत्रीय और पीड़ित-केंद्रित स्मृतियों के बीच प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण भी शामिल हैं। शोध के स्रोतों में अंगोला का राष्ट्रीय अभिलेखागार (Arquivo Nacional de Angola), औपनिवेशिक प्रशासनिक अभिलेख, मिशन और चर्च अभिलेखागार, पुर्तगाली सैन्य और सरकारी रिपोर्टें, पुरातात्त्विक साक्ष्य, मौखिक इतिहास, अगोस्तिन्यो नेटो विश्वविद्यालय (Universidade Agostinho Neto), स्थानीय पारंपरिक प्राधिकरण (Autoridades Tradicionais), राष्ट्रीय संग्रहालय (Museus Nacionais) और यूनेस्को के दस्तावेज़ शामिल हैं। क्षेत्रों के बीच स्रोत-आधार असमान है। इसलिए औपनिवेशिक श्रेणियों तथा एमपीएलए, यूनिटा और एफएनएलए के आधिकारिक आख्यानों और हताहतों के आँकड़ों की एक-दूसरे से तुलना की जानी चाहिए। राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत संस्थान (Instituto Nacional do Património Cultural), जिसे संक्षेप में आईएनपीसी (INPC) कहा जाता है, सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है; कार्य के अनुसार संस्कृति मंत्रालय, प्रांतीय और नगरपालिका निकाय तथा यूनेस्को भी जिम्मेदारी निभाते हैं। म्बान्ज़ा कोंगो 2017 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। राष्ट्रीय दासता संग्रहालय (Museu Nacional da Escravatura) की स्थापना 1977 में हुई। त्शितुन्दु-हुलु, कुइतो कुआनावाले और क्वान्ज़ा कॉरिडोर यूनेस्को की अस्थायी सूची में हैं। 4 फरवरी, 4 अप्रैल और 11 नवंबर प्रमुख राष्ट्रीय स्मरण दिवस हैं। अभिलेखागार, संग्रहालयों और ऐतिहासिक स्थलों तक पहुँच संस्था, स्थान, संरक्षण-स्थिति, सुरक्षा और संभावित परमिट पर निर्भर करती है; शुल्क या समय-सीमा पर एक समान राष्ट्रीय नियम की पुष्टि नहीं हुई है। म्बान्ज़ा कोंगो के संरक्षित क्षेत्र के भीतर निर्माण कार्य के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक है। मौखिक इतिहास मुख्यतः अनौपचारिक रूप से और भाग लेने वाले समुदायों या पारंपरिक प्राधिकरणों की सहमति से ही किया जाता है।
अंगोला का इतिहास — अंगोला में
अंगोला का इतिहास कई शताब्दियों में मानव समाजों, राजनीतिक केंद्रों, औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्र देश के विकास का वर्णन करता है। यह पुरापाषाणकालीन उपस्थिति और शैलचित्रों से लेकर कोंगो, न्दोंगो, मताम्बा और लुंडा, फिर पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन, 1975 की स्वतंत्रता और 2002 तक चले गृहयुद्ध तक फैला है। लुआंडा, मध्य उच्चभूमि, पूर्व, दक्षिण और काबिन्दा के अनुभवों में काफी भिन्नता है। अभिलेखागार, पुरातात्त्विक खोजें, मौखिक इतिहास, संग्रहालय और स्मारक परस्पर भिन्न व्याख्याओं और स्मरण के रूपों को सामने लाते हैं।
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