नाउरू का प्राकृतिक पर्यावरण एक उठे हुए प्रवाल द्वीप, तटीय मैदान, तटवर्ती प्रवाल-भित्ति, बुआडा लैगून, खनन किए गए फॉस्फेट पठार और आसपास के समुद्र को मिलाकर बना है। ये क्षेत्र नाउरू रीड वॉर्बलर, देशी पक्षियों और पौधों, प्रवाल-भित्ति की मछलियों, प्रवालों, विशाल क्लैम और घोंसला बनाने वाले हरे कछुओं को आवास देते हैं। तट के पास बस्तियों और बुनियादी ढाँचे, सीमित मीठे पानी, स्वच्छता और कचरा-प्रबंधन की बाधाओं तथा जलवायु-संबंधी खतरों के संपर्क से द्वीप का परिवेश बहुत प्रभावित होता है। मीठा पानी आम तौर पर घरेलू वर्षाजल टंकियों, विलवणीकरण या नाउरू की जल-उपयोगिता कंपनी (Nauru Utilities Corporation), जिसे NUC कहा जाता है, द्वारा की जाने वाली आपूर्ति से मिलता है, न कि देशव्यापी पाइपलाइन नेटवर्क से। इसलिए राष्ट्रीय एजेंसियाँ, समुदाय और घर-परिवार ऐसी जिम्मेदारियाँ साझा करते हैं जिन्हें अन्य स्थानों पर कोई नगरपालिका संभाल सकती है। पानी की उपलब्धता, भंडारण क्षमता, आपूर्ति की व्यवस्था और स्वच्छता की स्थितियाँ दैनिक जीवन तथा पर्यावरणीय स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। खनन ने भूमि पर व्यापक दबाव छोड़ा है और फॉस्फेट पठार की पुनर्बहाली की आवश्यकता बढ़ाई है। प्रदूषण, अत्यधिक उपयोग, जल-संकट और जलवायु परिवर्तन स्थलीय तथा समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों को भी प्रभावित करते हैं। 9 मार्च 2026 तक किसी औपचारिक स्थलीय या समुद्री संरक्षित क्षेत्र का रिकॉर्ड नहीं है। ऊँची भूमि पर विकास, खनन की गई भूमि की पुनर्बहाली और लचीले बुनियादी ढाँचे का उद्देश्य जोखिम कम करना है, हालांकि कई नियोजित प्रणालियाँ अभी बनाई जा रही हैं।
पर्यावरण: नाउरू में
नाउरू के पर्यावरण में इसके प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र और वह निर्मित परिवेश शामिल है जहाँ लोग रहते हैं, पानी प्राप्त करते हैं और कचरे का प्रबंधन करते हैं। द्वीप की उठी हुई प्रवाल भूमि, तट, प्रवाल-भित्ति, लैगून और आसपास का समुद्र विशिष्ट प्रजातियों को सहारा देते हैं, जबकि खनन, प्रदूषण, जल-संकट, स्वच्छता-व्यवस्था की सीमाएँ और जलवायु-संबंधी खतरे दबाव पैदा करते हैं। तटीय बस्तियाँ और बुनियादी ढाँचा नाउरू के भविष्य के लिए लचीले भूमि-उपयोग और पर्यावरणीय पुनर्बहाली को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
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